राहुल गांधी के भाषण पर गरमाई राजनीति: विशेषाधिकार हनन नहीं, लेकिन ‘मूल प्रस्ताव’ से बढ़ा तनाव

दिल्ली में संसद का वातावरण एक बार फिर गर्म है। लोकसभा में दिए गए एक भाषण ने राजनीतिक हलचल पैदा की है। बजट पर बोलते हुए विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने सरकार पर कई आरोप लगाए। सत्ता पक्ष ने इसके बाद तीव्र प्रतिक्रिया दी। समाचार आया कि उनके खिलाफ विशेषाधिकार हनन की मांग की जा सकती है। लेकिन यह अब स्पष्ट है कि ऐसा प्रस्ताव नहीं होगा। फिर भी बात नहीं सुलझी है। भाजपा सांसद ने एक “मूल प्रस्ताव” का नोटिस दिया है। इससे बहस बढ़ गई है।

पूरी बात समझना आवश्यक है। अब आसान शब्दों में इसे समझते हैं।

लोकसभा में क्या चर्चा हुई?

बजट बुधवार को लोकसभा में चर्चा में था। विपक्षी नेता राहुल गांधी ने भारत-अमेरिका ट्रेड डील पर प्रश्न उठाया। उनका दावा था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिका को “आत्मसमर्पण” कर दिया है। सदन में उनकी घोषणा से हंगामा हुआ।

अपने भाषण में राहुल गांधी ने जेफरी एपस्टीन, उद्योगपति अनिल अंबानी और अदानी समूह से जुड़े मुद्दों का भी उल्लेख किया। केंद्रीय मंत्री हरदीप पुरी पर भी आरोप लगाए गए थे। सत्ता पक्ष के लोग खड़े हो गए जब उन्होंने ये बातें कहीं। स्थिति तनावपूर्ण हो गई।

विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव चर्चा में क्यों आया?

राहुल गांधी के बयान पर भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने कड़ा विरोध जताया। उन्हें पहले खबर दी गई कि उनके खिलाफ विशेषाधिकार हनन की मांग की जा सकती है। लेकिन निशिकांत दुबे ने बाद में स्पष्ट किया कि ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं है।

उनका दावा था कि उन्होंने विशेषाधिकारों को हनन नहीं किया है। इसके बजाय, उन्हें एक “मूल प्रस्ताव” प्रस्तुत करने का नोटिस दिया गया है। पीटीआई समाचार एजेंसी ने इसकी पुष्टि की है।

इस घोषणा से साफ हुआ कि मामला कुछ अलग था। लेकिन बहस समाप्त नहीं हुई।

क्या अर्थ है “मूल प्रस्ताव”?

यह क्या है कि यह “मूल प्रस्ताव”?

मूल प्रस्ताव स्वतंत्र है। सदन इसे मंजूर करेगा। इस पर बहस होती है अगर लोकसभा अध्यक्ष इसे स्वीकार करते हैं। इसके बाद मतदान हो सकता है।

प्रस्ताव पारित होने से संबंधित सदस्य की सदस्यता प्रभावित हो सकती है। यानी मामला महत्वपूर्ण हो सकता है।

निशिकांत दुबे ने अपने नोटिस में कहा कि राहुल गांधी भारत विरोधी ताकतों से जुड़े रहे हैं। उनका दावा था कि यूएसएआईडी, सोरोस फाउंडेशन और फोर्ड फाउंडेशन ने राहुल गांधी का नाम जोड दिया है। साथ ही राहुल गांधी ने कई देशों की यात्राएं की हैं।

दुबे ने कहा कि राहुल गांधी को आजीवन चुनाव लड़ने से रोका जाए और उनकी सदस्यता रद्द की जाए। यह बड़ा दावा है। लेकिन फिलहाल यह सिर्फ एक नोटिस है। आगे की प्रक्रिया निर्णायक होगी।

सरकार ने क्या किया?

राहुल गांधी के भाषण को संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने “निराधार आरोप” बताया। उनका दावा था कि राहुल गांधी ने बिना किसी सबूत के अपने विचार व्यक्त किए हैं। रिजिजू ने यह भी कहा कि गलत कथनों को कार्यवाही से बाहर कर दिया जाएगा।

उन्हें स्पष्ट रूप से कहा गया कि संसद में बिना तर्क और प्रमाण के आरोप नहीं लगाने चाहिए। रिकॉर्ड से असंसदीय शब्दों को हटाया जाएगा।

राहुल गांधी की भी भाजपा नेता सुधांशु त्रिवेदी ने आलोचना की। संसद में बोलने का एक नियम है, उन्होंने कहा। हर सदस्य शालीन भाषा का उपयोग करना चाहिए। राहुल गांधी ने चेतावनी के बाद भी प्रधानमंत्री पर आरोप लगाए, उन्होंने कहा।

प्रियंका गांधी ने क्या स्पष्ट किया?

इस पूरे मुद्दे पर कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी ने प्रतिक्रिया व्यक्त की। उनका कहना था कि उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता अगर सरकार राहुल गांधी के खिलाफ विशेषाधिकार नोटिस या एफआईआर करती है।

प्रियंका गांधी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसानों का विश्वासघात किया है। उनका दावा था कि अमेरिका के साथ ट्रेड डील से किसान प्रभावित होंगे। इसलिए कांग्रेस लेबर यूनियन का समर्थन कर रही है और वे हड़ताल पर हैं।

उन्हें प्रधानमंत्री के खिलाफ भी नोटिस मिलना चाहिए था। कांग्रेस को पीछे हटने की इच्छा नहीं है, यह उनके बयान से स्पष्ट है।

क्या हरदीप पुरी ने सफाई दी?

अपने भाषण में राहुल गांधी ने जेफरी एपस्टीन का जिक्र किया। केंद्रीय मंत्री हरदीप पुरी ने एपस्टीन से अनिल अंबानी का परिचय कराया, उन्होंने कहा।

आरोप के बाद हरदीप पुरी ने एक प्रेस वार्ता की। उनका कहना था कि एपस्टीन से उनकी मुलाकात बहुत कम बार हुई थी। वह भी प्रतिनिधिमंडल में है। उनका दावा था कि उनके बीच सिर्फ एक ईमेल संदेश था।

पुरी ने आरोपों को अस्वीकार कर दिया। उनका कहना था कि उन्हें बेवजह बदनाम कर रहे हैं।

पहले भी बहस हुई थी

राहुल गांधी के बयान पर बहस हुई है। पिछले हफ्ते उन्होंने पूर्व सेना प्रमुख जनरल एमएम नरवणे की पुस्तक, “फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी” का जिक्र करने का प्रयास किया था।

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कहा कि अप्रकाशित भाग का उल्लेख नहीं करना चाहिए। इसके बाद विपक्ष ने कहा कि उनके नेता बोल नहीं रहे हैं।

यहां तक कि विपक्ष ने ओम बिरला को बर्खास्त करने के लिए अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिया है। यानी संसद पहले से ही तनावपूर्ण थी।

संसद का माहौल इतना गर्म क्यों है?

संसद में बहस होना आम है। लेकिन जब प्रधानमंत्री और मंत्रियों पर सीधे आरोप लगाए जाते हैं, तो हालात बिगड़ जाते हैं। इस बार भी हुआ।

ट्रेड डील पर राहुल गांधी ने प्रश्न उठाया। उन्हें लगता था कि देश के हितों से समझौता किया गया था। सरकार ने ये आरोप गलत बताए। दोनों पक्षों ने अपनी बात पर बल दिया है।

सत्ताधारी पक्ष का कहना है कि बिना सबूतों के आरोप लगाना अनुचित है। विपक्ष का कहना है कि वे सवाल करने का अधिकार रखते हैं।

क्या भविष्य में हो सकता है?

लोकसभा अध्यक्ष के फैसले पर अब ध्यान है। बातचीत अगर “मूल प्रस्ताव” स्वीकार होता है। इसके बाद मतदान हो सकता है। लेकिन इस प्रक्रिया को पूरा करना समय ले सकता है।

विशेषाधिकार हनन का कोई प्रस्ताव अभी नहीं आया है। यह स्पष्ट हो गया है। लेकिन राजनीति अंतिम नहीं होती। स्थिति बदल भी सकती है।

फिलहाल, संसद का वातावरण चिंताजनक है। यह आने वाले दिनों में देखना होगा कि मामला शांत होता है या और विकराल होता है।

उत्कर्ष

राहुल गांधी के भाषण ने राजनीतिक माहौल को गर्म कर दिया है। भाजपा ने विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव को खारिज कर दिया है, लेकिन उन्होंने “मूल प्रस्ताव” की घोषणा करके नई दिशा दी है। कांग्रेस नेता के पक्ष में है। सरकार आरोपों को नकारती है।

जवाब देना और सवाल उठाना लोकतंत्र का एक हिस्सा है। लेकिन संसद की गरिमा भी महत्वपूर्ण है। देश की जनता चाहती है कि विवाद हो, लेकिन शांतिपूर्वक हो।

सबका ध्यान अब अगले कदम पर है। क्या बहस समाप्त होगी? या फिर संसद में हंगामा होगा? इसका उत्तर आने वाले समय में मिलेगा।

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