तारिक़ रहमान की जीत: क्यों बदल गया भारत का रुख़ और क्यों माना जा रहा है यह सबसे बेहतर विकल्प?

बांग्लादेश की राजनीति ने बहुत कुछ बदल दिया है। लंबे समय तक सत्ता में रहने वाली शेख हसीना और उनकी पार्टी अवामी लीग इस बार चुनाव नहीं करेगी। जब परिणाम आया, चित्र स्पष्ट था। बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) ने बढ़त हासिल की। और उसके अध्यक्ष तारिक रहमान को नया प्रधानमंत्री बनाया गया। इससे भारत भी बदलता दिखा। सुबह-सुबह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बधाई संदेश भेजा। यह सिर्फ सामान्य व्यवहार नहीं था। यह एक संकेत था कि दिल्ली अब नए समीकरण में प्रवेश करना चाहती है।

यह कहानी सिर्फ एक विकल्प नहीं है। यह एक कहानी है जो समय, प्यार और संबंधों को बदलता है।

बधाई का सन्देश और बदली हुई वायु

13 फरवरी की सुबह करीब 9 बजे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया पर एक संदेश पोस्ट किया। BNP जीत गया। उनका कहना था कि यह जीत जनता के भरोसे को प्रदर्शित करती है। आधे घंटे बाद बंगाली भाषी संदेश भी भेजा गया। यह कदम अद्वितीय था। इससे बांग्लादेशियों को स्पष्ट रूप से पता चला कि भारत नई सरकार का स्वागत करता है।

भारत ने पहले भी हर चुनाव के बाद बधाई दी है। यह परंपरा अभी भी जारी है, चाहे दिल्ली में नरेंद्र मोदी हों या मनमोहन सिंह। लेकिन इस बार परिस्थितियां अलग थीं। क्योंकि इस बार बहुत बड़ा बदलाव हुआ था

तारिक रहमान की विशिष्टता क्या है?

तारिक रहमान कोई नवनियुक्त नेता नहीं हैं। BNP के कार्यवाहक अध्यक्ष हैं। वे लंदन में कई साल निर्वासन में रहे। उनके खिलाफ भी आरोप लगाए गए थे। लेकिन अब स्थिति बदल गई है। 5 अगस्त 2024 की राजनीतिक घटनाएँ बांग्लादेश में पूरी तरह से बदल गईं।

BNP सबसे मजबूत विकल्प बन गया जब लीग नहीं थी। दिल्ली में बैठे कई विश्लेषकों का कहना है कि भारत के पास इस समय बहुत कम विकल्प हैं। उसे बांग्लादेश की चुनी हुई सरकार के साथ काम करना होगा।

पहले संबंध क्यों नहीं बनते?

जब नरेंद्र मोदी 2014 में पूर्ण बहुमत से सत्ता में आए, तो बीएनपी से संपर्क करने की कोशिशें हुईं। प्रधानमंत्री को तारिक रहमान का तोहफा मिला। उसे बीजेपी नेता विजय जॉली ने दिल्ली भेजा। साथ ही अनौपचारिक बातचीत हुई।

लेकिन यह प्रयास आगे नहीं बढ़े। विशेषज्ञों का कहना है कि भारतीय एजेंसियों ने सतर्क रहने को कहा था। शेख हसीना उस समय प्रधानमंत्री थीं। वे बीएनपी और भारत के बीच किसी भी करीबी को लेकर चिंतित थीं।

ढाका में भारत के पूर्व उच्चायुक्त पिनाक रंजन चक्रवर्ती ने भी कहा कि उस दौर में सीधा संपर्क मुश्किल था। भारत ने इसलिए “ट्रैक टू” चैनल अपनाया। यानी थिंक टैंक, वरिष्ठ अधिकारी और विशेषज्ञों ने चर्चा जारी रखी।

रुख अब क्यों बदल गया?

समय निरंतर बदलता है। राजनीति भी परिवर्तित होती है। जब बांग्लादेश में अंतरिम सरकार आई और फिर चुनाव हुए, तब दिल्ली ने नई स्थिति को समझा। भारत को पता है कि पड़ोसी देश में मजबूत सरकार होना महत्वपूर्ण है।

दिल्ली के मनोहर पर्रिकर इंस्टीट्यूट फॉर डिफेंस स्टडीज एंड एनालिसिस की फेलो स्मृति पटनायक का मानना है कि बीएनपी सरकार भारत के साथ व्यावहारिक रुख अपनाएगी। वे कहती हैं कि शायद शेख हसीना के प्रत्यर्पण का मुद्दा बहुत ज्यादा चर्चा नहीं होगी। दिल्ली को इससे राहत मिली है।

भारत चाहता है कि रिश्ते किसी एक मुद्दे में फंसे रहें। वह व्यापार, सुरक्षा और सीमा क्षेत्रों में प्रगति चाहता है।

क्या है “बांग्लादेश पहले” नीति?

BNP अपनी विदेश नीति को “पहले बांग्लादेश” कहता है। इसका अर्थ है कि वह पहले अपने देश की सुरक्षा करेगी। लेकिन तारिक रहमान ने अपने हाल के भाषणों में भारत के खिलाफ तीखी भाषा नहीं बोली।

दिल्ली इसे एक उम्मीदपूर्ण संकेत समझती है। भारत चाहता है कि दोनों देश सहयोग करेंगे। सीमा पार आतंकवाद, अवैध व्यापार और नदी जल बंटवारा जैसे मुद्दे बातचीत से हल करें।

अल्पसंख्यक समस्या

भारत ने पिछले दो दशकों में बांग्लादेश में हिंदुओं सहित अल्पसंख्यकों पर कथित हमलों पर चिंता व्यक्त की है। इस मुद्दे पर अंतरिम सरकार भी परेशान रही।

बांग्लादेश ने कहा कि ये आरोप झूठ बोलकर लगाए गए। लेकिन भारत ने दोहराया। बीजेपी नेताओं ने स्पष्ट रूप से कहा कि अल्पसंख्यकों की सुरक्षा से रिश्ते नहीं हो सकते।

पश्चिम बंगाल में बीजेपी के प्रवक्ता देबजीत सरकार का कहना है कि स्थानीय परिस्थितियों में बदलाव आना चाहिए। वे कहते हैं कि सरकार बदलने से कोई सुधार नहीं होगा; असली सुधार चाहिए।

यह नई सरकार के सामने एक महत्वपूर्ण चुनौती होगी। वह अल्पसंख्यकों को सुरक्षित रखेगा, तो भारत के प्रति भरोसा बढ़ेगा।

दिल्ली का विचार क्या है?

नई दिल्ली में अभी स्थिति सकारात्मक है। नए प्रधानमंत्री को केंद्रीय सरकार ने गर्मजोशी से स्वागत किया है। इसका कारण स्पष्ट है। भारत अपने आसपास के क्षेत्रों में स्थिरता चाहता है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बीजेपी और बीएनपी की विचारधारा में कुछ समानता है। दोनों राष्ट्रवादी हैं और मध्य-दक्षिणपंथी हैं। इससे राजनीतिक ज्ञान मिल सकता है।

यह भी सच है कि अतीत में रिश्ते हमेशा आसान नहीं रहे हैं। 2001 से 2006 के बीएनपी शासनकाल में कुछ विवाद हुए। भारत अब पुराने मुद्दों को भूलना चाहता है और आगे बढ़ना चाहता है।

क्या यह U-turn है?

इसे कूटनीतिक यू-टर्न भी कहते हैं। भारत को पहले अवामी लीग से संबंधित माना जाता था। अब वह BP से खुलकर बोलता है।

राजनीति में, हालांकि, स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होते। देश अपने फायदे को देखता है। भारत भी ऐसा करता है। वर्तमान परिस्थितियों में किसके साथ काम करना बेहतर रहेगा, वह देख रहा है।

तारिक रहमान का आश्वासन भी महत्वपूर्ण माना जाएगा। माना जाता है कि उन्होंने द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत बनाए रखने का वादा किया है। अगर ऐसा है, तो दिल्ली को विश्वास करना चाहिए।

आगे की दिशा

असली परीक्षा अब शुरू होगी। चुनाव जीतना एक है। सरकार चलाना अलग है। तारिक रहमान की छवि भी मजबूत होनी चाहिए। उन्हें दिखाना होगा कि वे परिवर्तित हो गए हैं और राजनीति के नवीन युग को समझते हैं।

भारत भी देखेगा। वह हर कदम को परखेगा। मुद्दों पर चर्चा होगी। भावनाओं से अधिक ध्यान काम पर रहेगा।

दोनों देशों के लिए सीमा सुरक्षा, व्यापार, ऊर्जा और संपर्क योजनाएं महत्वपूर्ण हैं। इन पर जल्दी काम करने से संबंध मजबूत होंगे।

क्यों सबसे अच्छा विकल्प माना जाता है

दिल्ली में तारिक रहमान को फिलहाल सबसे अच्छा विकल्प मानने के कई कारण हैं। पहली वजह राजनीतिक वास्तविकता है। इस बार आवामी लीग नहीं होगी। BNPP को जनता ने समर्थन दिया।

स्थिरता दूसरा कारण है। अंतरिम सरकार बहुत देर नहीं चलेगी। चुनी हुई सरकार से सहयोग करना आसान है।

तीसरा तर्क संवाद करने की इच्छा है। नई सरकार खुले मन से भारत से बातचीत कर सकती है, तो कई पुराने मुद्दे हल हो सकते हैं।

रणनीतिक आवश्यकता भी चौथा कारण है। भारत का महत्वपूर्ण पड़ोसी बांग्लादेश है। दोनों देशों के बीच लंबी सीमा है। दोनों की अर्थव्यवस्था एक साथ काम करती है। ऐसे अच्छे संबंध दोनों के लिए लाभदायक हैं।

उत्कर्ष

बांग्लादेश की राजनीति ने एक नई दिशा ली है। प्रधानमंत्री तारिक रहमान का नाम अब लिया जा रहा है। भारत ने तुरंत बधाई देकर स्पष्ट कर दिया कि वह नए चरण के लिए तैयार है।

यह मार्ग सरल नहीं होगा। प्रश्न उठेंगे। चुनौतियाँ सामने आएँगी। लेकिन यह बदलाव एक नई शुरुआत हो सकता है अगर दोनों देश सहमत होते हैं।

फिलहाल, दिल्ली का विचार स्पष्ट है। आज भारत के लिए तारिक रहमान सबसे उपयुक्त और उपयुक्त विकल्प हैं। अब यह देखना होगा कि यह उम्मीद कितनी दूर तक जाती है और दोनों देश मिलकर भविष्य को कैसा बनाते हैं।

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