बांग्लादेश में 12 फरवरी 2026 को आम चुनाव के लिए मतदान हो रहे हैं। यह चुनाव साधारण नहीं है। इस बार देश की राजनीति पूरी तरह बदल चुकी है। अवामी लीग चुनाव में नहीं है। ऐसे में सबकी नजर बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी यानी बीएनपी पर है। सवाल बड़ा है। क्या तारिक रहमान देश के अगले प्रधानमंत्री बनेंगे? क्या जनता उन्हें स्वीकार करेगी? और भारत के साथ रिश्तों पर उनका रुख कैसा रहेगा? यही सब इस चुनाव को खास बना रहा है।
क्यों खास है 2026 का चुनाव
इस बार चुनाव का माहौल अलग है। लंबे समय तक सत्ता में रही अवामी लीग इस बार मैदान में नहीं है। 5 अगस्त 2024 को शेख हसीना के तख्तापलट के बाद देश की राजनीति बदल गई। अवामी लीग पर चुनावी प्रतिबंध लग गया। अब मुख्य मुकाबला बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी के बीच है।
पहले चुनावों में अवामी लीग की मजबूत पकड़ थी। 2009, 2014, 2018 और 2024 में शेख हसीना की पार्टी ने बड़ी जीत दर्ज की। 2014 में बीएनपी ने धांधली के आरोप लगाए थे। 2024 में बीएनपी ने चुनाव का बहिष्कार किया था। लेकिन अब तस्वीर बदल गई है। अब बीएनपी खुद को सबसे बड़ी ताकत मान रही है।
बीएनपी का इतिहास और विरासत
बीएनपी यानी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की स्थापना 1 सितंबर 1978 को जियाउर्रहमान ने की थी। यह देश की पुरानी पार्टियों में से एक है। खालिदा जिया ने 1991 में पहली बार प्रधानमंत्री पद संभाला। फिर 2001 में वे दोबारा सत्ता में आईं। उस समय जमात-ए-इस्लामी भी सरकार में शामिल थी।
लेकिन 2006 के बाद से बीएनपी सत्ता में वापसी नहीं कर पाई। पार्टी ने कई उतार-चढ़ाव देखे। नेताओं को जेल जाना पड़ा। कार्यकर्ताओं को मुश्किलों का सामना करना पड़ा। फिर भी पार्टी जमी रही।
लंदन से ढाका तक तारिक रहमान की वापसी
तारिक रहमान लंबे समय तक लंदन में निर्वासन में रहे। उनकी मां खालिदा जिया जेल में थीं। शेख हसीना के देश छोड़ने के बाद हालात बदले। खालिदा जिया को रिहा किया गया। तारिक रहमान भी ढाका लौटे।
वे ऐसे समय लौटे जब उनकी मां बहुत बीमार थीं। कुछ ही समय बाद खालिदा जिया का निधन हो गया। यह बीएनपी के लिए भावुक पल था। इसी समय तारिक रहमान ने पार्टी की कमान संभाली।
उन्होंने तुरंत चुनाव की तैयारी शुरू की। वे रैलियों में गए। लोगों से मिले। उन्होंने खुद को मजबूत नेता के रूप में पेश किया। लेकिन सवाल बना रहा। इतने साल देश से दूर रहने के बाद क्या वे जनता की नब्ज समझ पाएंगे?
चुनाव प्रचार में पूरी ताकत
तारिक रहमान ने चुनाव प्रचार में कोई कमी नहीं छोड़ी। उन्होंने नारा दिया, “Bangladesh Before All।” यह नारा सीधा और साफ है। वे कह रहे हैं कि देश सबसे पहले है।
बीएनपी 300 में से 292 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। 8 सीटें सहयोगी दलों को दी गई हैं। खुद तारिक रहमान दो सीटों से चुनाव लड़ रहे हैं। वे प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हैं।
उन्होंने अपना घोषणापत्र भी जारी किया। उसमें कई बड़े वादे किए गए। उन्होंने जुलाई नेशनल चार्टर लागू करने की बात कही। उन्होंने कहा कि मुक्ति आंदोलन का सही इतिहास पढ़ाया जाएगा। वे उप राष्ट्रपति का पद बनाने की बात कर रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि कोई भी व्यक्ति 10 साल से ज्यादा प्रधानमंत्री नहीं रह सकेगा।
उन्होंने संसद में 100 सदस्यीय उच्च सदन बनाने का वादा किया। जुलाई 2024 की हिंसा की जांच के लिए स्वतंत्र आयोग बनाने की बात कही। उन्होंने पड़ोसी देशों से दोस्ती मजबूत करने का वादा किया। मुस्लिम देशों के साथ सहयोग बढ़ाने की भी बात कही।
बीएनपी के सामने बड़ी चुनौती
बीएनपी का रास्ता आसान नहीं है। जमात-ए-इस्लामी मजबूत होकर सामने है। उसके साथ युवाओं की नई पार्टी एनसीपी का गठबंधन है। यह गठबंधन युवाओं को आकर्षित कर सकता है।
युवा वर्ग बदलाव चाहता है। वह नई सोच चाहता है। अगर युवा एनसीपी के साथ जाता है, तो बीएनपी को नुकसान हो सकता है। दूसरी ओर, जो लोग इस्लामी शासन के कट्टर समर्थक हैं, वे जमात के साथ जा सकते हैं।
ऐसे में बीएनपी को हर वर्ग को साथ लाना होगा। तारिक रहमान को यह दिखाना होगा कि वे सबके नेता हैं।
क्या शेख हसीना के समर्थक बीएनपी का साथ देंगे?
यह चुनाव का बड़ा सवाल है। शेख हसीना के समर्थक किसे वोट देंगे? अवामी लीग चुनाव में नहीं है। ऐसे में उनके समर्थक खाली नहीं बैठेंगे।
जमात-ए-इस्लामी को वे शायद स्वीकार न करें। 1971 के मुक्ति आंदोलन के समय जमात ने अलग रुख अपनाया था। शेख हसीना के शासन में जमात पर कई बार प्रतिबंध भी लगे। ऐसे में अवामी लीग का समर्थक जमात के साथ जाने में हिचक सकता है।
अगर वे जमात से दूर रहते हैं, तो उनका वोट बीएनपी को मिल सकता है। यह बीएनपी के लिए बड़ा फायदा होगा। तारिक रहमान को सहानुभूति भी मिल सकती है क्योंकि उनकी मां का हाल ही में निधन हुआ है।
भारत के साथ रिश्तों पर सबकी नजर
भारत और बांग्लादेश के रिश्ते बहुत खास हैं। दोनों देशों के बीच गहरे संबंध हैं। आम लोग चाहते हैं कि रिश्ते अच्छे रहें। व्यापार हो। दोस्ती बनी रहे।
जब खालिदा जिया का निधन हुआ, तब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शोक संदेश भेजा। भारत के विदेश मंत्री डॉ एस जयशंकर ढाका गए और अंतिम संस्कार में शामिल हुए। उन्होंने मोदी की ओर से संदेश भी सौंपा।
यह दिखाता है कि भारत इस चुनाव को ध्यान से देख रहा है। अगर तारिक रहमान सत्ता में आते हैं, तो उनके भारत के साथ संबंधों को परखा जाएगा। उन्होंने अपने घोषणापत्र में पड़ोसी देशों से समानता और सहयोग की बात कही है। यह संकेत सकारात्मक माना जा रहा है।
जनता क्या चाहती है?
बांग्लादेश की जनता शांति चाहती है। लोग स्थिर सरकार चाहते हैं। वे रोजगार चाहते हैं। वे महंगाई कम देखना चाहते हैं। वे शिक्षा और स्वास्थ्य में सुधार चाहते हैं।
लोग थक चुके हैं राजनीतिक टकराव से। वे साफ शासन चाहते हैं। वे ऐसा नेता चाहते हैं जो सुन सके। जो समझ सके। जो फैसले ले सके।
तारिक रहमान को यह भरोसा दिलाना होगा कि वे ऐसा कर सकते हैं। उन्हें यह भी दिखाना होगा कि वे सिर्फ एक परिवार की विरासत नहीं हैं, बल्कि खुद भी सक्षम नेता हैं।
आगे क्या होगा?
चुनाव का नतीजा बहुत कुछ तय करेगा। अगर बीएनपी जीतती है, तो यह उसके लिए बड़ी वापसी होगी। अगर जमात गठबंधन जीतता है, तो देश की दिशा अलग हो सकती है।
यह चुनाव सिर्फ सत्ता का नहीं है। यह भविष्य का चुनाव है। यह तय करेगा कि बांग्लादेश किस रास्ते पर चलेगा।
तारिक रहमान के सामने बड़ी परीक्षा है। वे नए हैं, लेकिन पुराने नाम के साथ हैं। वे उम्मीद भी हैं और सवाल भी। जनता का फैसला जल्द सामने आएगा।
पूरी दुनिया इस चुनाव को देख रही है। खासकर भारत। अब देखना है कि बांग्लादेश की जनता किसे चुनती है। क्या वे बीएनपी को एक और मौका देंगे? या कोई नया रास्ता चुनेंगे?
फैसला अब जनता के हाथ में है।