संघ कहेगा तो पद छोड़ दूंगा, लेकिन काम नहीं छोड़ूंगा: मोहन भागवत का साफ संदेश

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने भ्रष्टाचार, भाषा, समाज, नेतृत्व और रिटायरमेंट जैसे कई महत्वपूर्ण प्रश्नों पर खुलकर चर्चा की है। संघ के सौ वर्ष पूरे होने पर एक कार्यक्रम में उन्होंने सरल शब्दों में अपनी राय व्यक्त की। उनका सन्देश स्पष्ट था। पद छोड़ सकते हैं, लेकिन यह काम नहीं करेगा। यह बातचीत सरल, आसान और आम लोगों को समझ में आती रही।

पद छोड़ दूंगा अगर संघ कहेगा।

मोहन भागवत ने कहा कि अगर संघ उनसे पद छोड़ने को कहेगा तो वे उसी दिन इस्तीफा दे देंगे। साथ ही उन्होंने स्पष्ट किया कि वह अपने पद से कभी नहीं रिटायर होंगे। उन्होंने कहा कि 75 साल की उम्र के बाद आम तौर पर किसी पद पर नहीं रहना चाहिए। उन्हें 75 वर्ष पूरे होने पर संघ को भी सूचित किया गया था। लेकिन संघ ने उनसे काम करना चाहा। इसलिए वह आज भी संघ प्रमुख हैं।

पद नहीं, सेवा महत्वपूर्ण

संघ में पद से ज्यादा सेवा महत्वपूर्ण है, भागवत ने कहा। यहां काम करने की उम्र की कोई सीमा नहीं है। यदि कोई काम कर सकता है, तो वह काम करता रहता है। मजाक में उन्होंने कहा कि संघ अपने स्वयंसेवकों से खून के आखिरी कतरे तक काम करता है। साथ ही, उन्होंने कहा कि संघ की इतिहास में कभी किसी को जबरन रिटायर नहीं किया गया था।

संघ प्रमुख बनने का तरीका

उनका कहना था कि आरएसएस अध्यक्ष पद पर कोई चुनाव नहीं होगा। यह निर्णय मंडल और क्षेत्रीय स्तर के वरिष्ठ कार्यकर्ताओं द्वारा किया जाता है। यह शांत और सहमति से होता है। प्रचार या राजनीति इसमें नहीं होती। योग्य व्यक्ति आगे आते हैं।

संघ का अध्यक्ष हिंदू क्यों है?

मोहन भागवत ने कहा कि हिंदू संघ प्रमुख होना चाहिए। लेकिन कोई भी उसकी जाति हो सकता है। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि संघ में जातिगत भेदभाव नहीं होता। स्वयंसेवक अपने काम पर आगे बढ़ते हैं। यहां काम से प्रतिनिधित्व मिलता है, न कि समुदाय से।

ब्राह्मण बनने के लिए योग्य नहीं

Bhagavad Gita ने कहा कि ब्राह्मण होना संघ प्रमुख बनने के लिए कोई विशिष्ट योग्यता नहीं है। उन्होंने कहा कि संघ की शुरुआत में ब्राह्मण समाज में अधिक काम हुआ था। इसलिए शुरू में बहुत से संस्थापक ब्राह्मण थे। लोगों ने सोचा कि यह एक ब्राह्मण संगठन है। लेकिन यह विचार समय के साथ बदल गया है। आज संघ में हर वर्ग और समुदाय का व्यक्ति शामिल है।

जाति और जनजाति की सूची

उनका कहना था कि अनुसूचित जनजाति या जाति से होना कोई अयोग्यता नहीं है। भविष्य में इन समुदायों से कोई प्रतिभाशाली व्यक्ति संघ का नेतृत्व कर सकता है। वर्तमान परिस्थितियां और चयनकर्ता इस निर्णय को प्रभावित करते हैं। भागवत ने कहा कि जब उन्हें संघ प्रमुख बनाया गया, बहुत से योग्य लोग थे। उस समय वे उपलब्ध नहीं थे। इसलिए उन्हें यह काम सौंपा गया था।

समस्याओं से अधिक समाधान चाहिए

मोहन भागवत ने कहा कि हमें समस्याओं पर अधिक ध्यान नहीं देना चाहिए। हमें समाधान खोजने की जरूरत है। भ्रम तब तक रहता है जब तक सच्चाई सामने नहीं आती। उनका कहना था कि परिस्थितियां कभी अच्छी होती हैं और कभी मुश्किल होती हैं। लेकिन कार्य जारी रहना चाहिए।

संघ की भूमिका चुनाव प्रचार नहीं है

Bhagavad Gita ने स्पष्ट रूप से कहा कि संघ का कार्य चुनाव प्रचार करना नहीं है। संघ का लक्ष्य संस्कार बनाना है। लोगों का व्यक्तित्व मजबूत करना है। उन्हें लगता था कि संघ प्रचार में बहुत पीछे रह गया है। उनका कहना था कि अधिक प्रचार से प्रसिद्धि मिल सकती है, लेकिन अहंकार भी आ सकता है। इससे बचना महत्वपूर्ण है।

विज्ञापन बारिश की तरह हो

उनका प्रचार बारिश से जुड़ा था। उनका कहना था कि सही समय और मात्रा में बारिश होने पर फसल अच्छी होती है। लेकिन अधिक बारिश घातक है। उसी प्रकार प्रचार भी संतुलित होना चाहिए। अब संघ जनसंपर्क अभियान चला रहा है, ताकि लोग संघ की नीतियों को समझ सकें।

भाषा पर स्पष्ट विचार

मोहन भागवत ने कहा कि अंग्रेजी कभी संघ के कामकाज में मुख्य भाषा नहीं होगी। उनका दावा था कि अंग्रेजी भारतीय भाषा नहीं है। भारतीय भाषाएं आवश्यक हैं क्योंकि संघ भारतीयों के साथ काम करता है। यदि आवश्यक हो, अंग्रेजी का उपयोग किया जाएगा। संघ इससे चिंतित नहीं है।

मातृभाषा को भूलना नहीं, अंग्रेजी सीखना महत्वपूर्ण है

उनका कहना था कि लोगों को अंग्रेजी बोलने में माहिर होना चाहिए। इस तरह कि अंग्रेजी बोलने वाले लोग इसे सुनना चाहेंगे। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हम अपनी मातृभाषा को भूल जाएं। उन्होंने बेंगलुरु में हुई एक बातचीत का उल्लेख किया। वहां बहुत से लोग हिंदी बोल नहीं पा रहे थे। बाद में उन्होंने अंग्रेजी में उत्तर दिया।

प्रवासी भारतीयों से बातचीत

Bhagwat ने कहा कि विदेश में रहने वाले भारतीयों से हिंदी या उनकी मातृभाषा में बातचीत की जाती है। यह उनके देश पर निर्भर करता है। बातचीत अंग्रेजी बोलने वाले देश में अलग हो सकती है।

मुसलमान समाज में संघ की भूमिका

मुस्लिम समाज में संघ का काम पूछा गया। इस पर भागवत ने कहा कि टकराव होगा अगर दोनों पक्ष एक-दूसरे को विरोध करेंगे। यह काम नहीं करेगा। संघ किसी भी धर्म या जाति के खिलाफ नहीं है। भौगोलिक आधार संघ का काम है।

हर जगह काम करने का प्रयास

उनका कहना था कि संघ किसी क्षेत्र में 10,000 लोगों के साथ काम करने की कोशिश करता है। संघ हर जगह पहुंच जाएगा, जिससे हर समुदाय को अपने आप पहुँच मिल जाएगी। संघ के शीर्ष नेतृत्व में लगभग हर समुदाय का प्रतिनिधित्व है, उन्होंने कहा।

भ्रष्टाचार को कम करना

संघ भ्रष्टाचार के खिलाफ है, मोहन भागवत ने कहा। भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने वालों को संघ मदद करता है। ऐसा स्वयंसेवकों को भी करने को कहा गया है। संघ कठोर कानूनों और नियमों को मानता है।

भ्रष्टाचार मन में होता है

उनका कहना था कि व्यवस्था ही भ्रष्टाचार करती है। यह भी लोगों के मन में भरा है। कुछ लोग इससे लड़ते हैं, जबकि दूसरे इसे फैलाते हैं। ईमानदार लोगों के साथ संघ खड़ा है।

संघ की विचारधारा

मोहन भागवत की विचारधारा इस पूरे बहस में स्पष्ट थी। उनके पास पद से अधिक काम है। सेवा सर्वोपरि है। भाषा, समाज और नेतृत्व के बारे में उनका विचार स्पष्ट और सरल है। उन्हें बार-बार बताया गया था कि संघ का लक्ष्य समाज को एकजुट करना है, न कि उसे तोड़ना है।

उत्कर्ष

मोहन भागवत के बयान से स्पष्ट है कि आरएसएस खुद को एक सेवा संस्थान मानता है। यहाँ काम करने के लिए कोई उम्र सीमा नहीं है। जाति या समुदाय से अधिक योग्यता महत्वपूर्ण है। संस्कार, बातचीत और समाधान संघ की प्राथमिकता हैं। इस अवसर पर उन्होंने यही संदेश देश को भेजा।

Leave a Comment