एनसीपी के एक होने की उम्मीदों पर साया: अजित पवार के निधन से क्यों बढ़ी राजनीतिक अनिश्चितता?

पिछले कुछ महीनों से महाराष्ट्र की राजनीति में एक नई उम्मीद दिखाई दे रही है। यह अनुमान लगाया गया था कि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के दो भाग फिर से एक हो सकते हैं। पार्टी के 2023 में टूटने के बाद भी पवार परिवार ने बातचीत की। इस उम्मीद को स्थानीय चुनावों में दोनों पार्टियों का एकजुट होना और मजबूत कर रहा था। लेकिन आज यह चित्र अचानक बदल गया है। राज्य की राजनीति में उपमुख्यमंत्री अजित पवार की अचानक निधन ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं, साथ ही एनसीपी के एक होने की संभावना भी।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अजित पवार इस समझौते का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा थे। अब एनसीपी का भविष्य निर्धारित करना मुश्किल हो गया है क्योंकि वे चले गए हैं।

एनसीपी का विभाजित होना और पवार परिवार का योगदान

महाराष्ट्र की राजनीति ने 2023 में एनसीपी को दो भागों में विभाजित कर दिया था। अजित पवार का गुट था, जो बाद में सरकार में शामिल हुआ। इसके विपरीत, पार्टी के संस्थापक शरद पवार के नेतृत्व वाले गुट ने अलग मार्ग चुना।

पवार परिवार के रिश्ते टूट नहीं गए, हालांकि पार्टी टूट गई थी। परिवार के सदस्यों ने सार्वजनिक मंचों पर एक-दूसरे को सम्मान देते रहे। यही कारण था कि राजनीति में भी बातचीत होती रही।

अजित पवार का बड़ा सपना

अजित पवार ने स्पष्ट रूप से कहा कि उनका सबसे बड़ा राजनीतिक लक्ष्य एनसीपी को फिर से एक करना है। साथ ही उन्होंने कहा कि शरद पवार की सलाह के बिना यह काम संभव नहीं है। एक सार्वजनिक कार्यक्रम में उन्होंने स्वीकार किया कि शरद पवार ने ही उन्हें राजनीति में आगे बढ़ने का अवसर दिया था।

उनके शब्दों से साफ झलकता था कि वे असहमति को दूर करना चाहते थे। वे चाहते थे कि पार्टी फिर से मजबूत हो और एकजुट होकर महाराष्ट्र की राजनीति में अपना स्थान बनाए।

स्थानीय चुनावों ने उम्मीद बढ़ाई

एनसीपी के दोनों गुटों ने हाल ही में हुए स्थानीय निकाय चुनावों में कई जगहों पर मिलकर चुनाव लड़ा। यह कदम आम नहीं था। राजनीतिक गलियारों में इसे एक महत्वपूर्ण संकेत के रूप में देखा गया।

साथ मिलकर चर्चाएं इतनी तेज हो गईं कि चुनाव खत्म होते ही दोनों पक्षों के बीच औपचारिक बातचीत शुरू हो सकती है। कई नेताओं ने भी बंद कमरे में हुई बैठकों को मान लिया। इससे कर्मचारियों में भी नई उत्साह दिखाई देता था।

प्रमुख बैठक बारामती में

17 जनवरी को बारामती में हुई एक बैठक को पूरी प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण पड़ाव बताया गया था। इस बैठक में शरद पवार भी उपस्थित थे। सभा में यह निर्णय लिया गया कि पहले स्थानीय चुनाव गठबंधन में होंगे, फिर पार्टी का भविष्य सोचा जाएगा।

यह बैठक खास भी थी क्योंकि इसमें अजित पवार की सबसे सक्रिय भूमिका मानी जाती थी। वे दोनों पक्षों की बात सुनकर एक समाधान निकालने की कोशिश करते थे।

अचानक परिस्थितियों में बदलाव

लेकिन सब कुछ अजित पवार की अचानक निधन से बदल गया। जिस नेता को दोनों पक्षों को संतुलित करने की उम्मीद थी, वह अब नहीं है। इसके बाद यह प्रश्न उठने लगा कि क्या अब एनसीपी बनना संभव है।

राजनीति में भावनाओं और रणनीति दोनों महत्वपूर्ण हैं। इन दोनों को अजित पवार ने साथ चलाया। अब उनके बिना फैसले लेना मुश्किल होगा।

दो मार्ग, दो गुट

NCPA आज मुश्किल में है। एक ओर, मौजूदा सरकार में अजित पवार गुट से कई वरिष्ठ विधायक शामिल हैं। वे शासन करना चाहते हैं। दूसरी ओर, शरद पवार के गुट के नेता दिखते हैं कि वे अपने विचारों को बदलने को तैयार नहीं हैं।

इस गुट के नेताओं का मानना है कि उनकी राजनीति का आधार ‘फुले-शाहू-आंबेडकर’ है। सत्ता से अधिक उनके लिए विचार महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में दोनों पक्षों को एकजुट करना पहले से कहीं अधिक कठिन हो गया है।

सिर्फ संगठन नहीं, विचार भी

एनसीपी का एकीकरण होना अब केवल एक संगठनात्मक प्रश्न नहीं रह गया है। यह भी एक वैचारिक परीक्षा है। सवाल यह है कि दोनों पक्ष एक साझा विचार पर सहमत हो पाएंगे या नहीं।

अजित पवार ने इस वैचारिक दूरी को कम करने का प्रयास किया था। राजनीति में लचीलापन अनिवार्य था। अब उनके बिना संतुलन बनाना मुश्किल हो सकता है।

कार्यकर्ताओं की बेचैनी बढ़ी

इस समय पार्टी के कार्यकर्ता सबसे अधिक असमंजस में हैं। बहुत से कार्यकर्ता एक मजबूत नेतृत्व और पार्टी की पुनर्गठन की उम्मीद कर रहे थे। लेकिन वे अब भविष्य की चिंता कर रहे हैं।

एनसीपी ग्रामीण क्षेत्रों में मजबूत पकड़ रखता है। उस क्षेत्र में काम करने वाले लोग चाहते हैं कि पार्टी अपने मतभेद भूलकर आगे बढ़े। लेकिन शीर्ष पर स्पष्ट दिशा नहीं होने से नीचे तक भ्रम फैल रहा है।

महाराष्ट्र राजनीति पर प्रभाव

एनसीपी की स्थिति पार्टी तक नहीं सीमित है। इससे महाराष्ट्र की राजनीति प्रभावित होगी। अगर पार्टी एक नहीं बन सकती, तो दूसरी पार्टियां इसका फायदा उठा सकती हैं।

विपक्ष भी कमजोर हो सकता है। वहीं समीकरण सत्ताधारी पक्ष में भी बदल सकते हैं। यही कारण है कि आने वाले महीनों में महाराष्ट्र की राजनीति बहुत रोचक होगी।

अब क्या होगा?

अब एनसीपी का अगला निर्णय सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है। क्या दोनों गुट बातचीत जारी रखेंगे या अपने-अपने रास्ते पर ही चलेंगे? इस फैसले को और अधिक मुश्किल बना रहा है क्योंकि अजित पवार नहीं हैं।

पार्टी को शायद श्रीमती पवार का अनुभव मदद कर सकता है। यह अभी स्पष्ट नहीं है कि वे दोनों पक्षों को एकजुट कर पाएंगे या नहीं।

उत्कर्ष

महाराष्ट्र की राजनीति को अजित पवार की निधन से बड़ा नुकसान हुआ है। वे एनसीपी के दो भागों को एकजुट करने वाले नेता भी थे। उनके जाने से पार्टी के सदस्य होने की उम्मीदें गहरी टूट गई हैं।

NCPA अब सामने आने वाली सबसे बड़ी चुनौती है। पार्टी इस मुश्किल दौर से कैसे बाहर निकलती है, यह देखना होगा। क्या वह एकता की ओर जाएगी या विभाजन की कहानी और लंबी होगी? भविष्य में इसका जवाब मिलेगा।

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