दुनिया की राजनीति में कभी-कभी आम लोगों की जिंदगी भी प्रभावित होती है। इस बार ग्रीनलैंड कारण है। यह बर्फ से ढका शांत द्वीप अचानक यूरोप और अमेरिका के बीच संघर्ष का केंद्र बन गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने यूरोपीय देशों पर 10% टैरिफ लगाने की घोषणा की। इसके बाद पूरे यूरोप में हड़कंप मच गया। जर्मनी ने कदम पीछे खींचा, लेकिन अब भी कई देश डटे हुए हैं।
सेना या टैक्स ही खबर नहीं है। शक्ति, प्रभाव और विश्वव्यापी राजनीति यह कहानी हैं।
ग्रीनलैंड की बहस क्यों शुरू हुई?
ग्रीनलैंड दिखने में शांत है, लेकिन यह एक महत्वपूर्ण स्थान है। यह एक आर्कटिक क्षेत्र में है। यहां से समुद्री रास्तों और संसाधनों का पता चलता है।
लंबे समय से अमेरिका ने ग्रीनलैंड में रुचि दिखाई है। ट्रंप ने इस बार इसे खरीदने तक की बात की। यूरोपीय देशों ने सोचा कि यह उनकी संप्रभुता को खतरा था।
यहीं से संघर्ष शुरू हुआ।
ट्रंप का बड़ा दांव: १०% टैरिफ
ट्रंप ने सीधे घोषणा की कि यूरोपीय देशों से आने वाली वस्तुओं पर दस प्रतिशत अतिरिक्त टैक्स लगेगा।
इसमें निम्नलिखित देश शामिल हैं:
- जर्मनी
- फ्रांस
- डेनमार्क
- नॉर्वे
- स्वीडन
- यूनाइटेड किंगडम
- नीदरलैंड
- फिनलैंड
ट्रंप ने स्पष्ट रूप से कहा कि अगर नहीं मानी गई तो 1 जून से यह टैक्स 25 प्रतिशत हो जाएगा।
ग्रीनलैंड पर समझौता करने से आर्थिक नुकसान होगा, यह उनका साफ संदेश था।
टैरिफ का सीधा प्रभाव
1 फरवरी से 10 प्रतिशत का अतिरिक्त टैरिफ लागू होना चाहिए।
अगर विवाद जारी रहा, तो यह जून से बढ़ जाएगा।
यूरोपीय कंपनियों को इससे नुकसान होगा।
निर्यात खर्चीला होगा।
नौकरी भी प्रभावित हो सकती है।
यूरोप यह दबाव की राजनीति कहता है।
जर्मनी का ‘उदारीकरण’
जर्मनी ने सबसे बड़ा बदलाव देखा।
एबीसी न्यूज़ ने बताया कि जर्मनी ने अपनी 15 सैनिकों की टोही टीम को ग्रीनलैंड से वापस बुलाने का निर्णय लिया है।
ये सैनिक नागरिक विमान से कोपेनहेगन वापस आ रहे हैं।
जर्मनी ने इसे “वापसी” कहा।
लेकिन ट्रंप के दबाव को जानकार मानते हैं।
जर्मनी की अर्थव्यवस्था पहले से ही कमजोर हो गई है।
वह यूएस से सीधा संघर्ष नहीं चाहता।
आठ देश अभी भी संघर्षरत हैं
जबकि जर्मनी पीछे हट गया, आठ यूरोपीय देश अब भी पीछे हैं।
इन देशों ने ग्रीनलैंड में अपनी उपस्थिति बचाई है।
फाइटर जेट्स पर उतार दिए गए हैं।
यह स्पष्ट रूप से बताता है कि यूरोप पूरी तरह से झुकने को तैयार नहीं है।
यूरोपीय संघ का जवाब
यूरोपीय संघ की राष्ट्रपति Ursula von der Leyen ने एकजुटता का आह्वान किया।
उन्हें सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर लिखा कि सभी को आर्कटिक में शांति और सुरक्षा चाहिए।
उनका चेतावनी था कि टैरिफ से ट्रांस-अटलांटिक संबंध कमजोर हो जाएंगे।
यूरोप अपनी स्वतंत्रता को बचाएगा।
उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि दबाव से फैसला नहीं बदला जाएगा।
काजा कैलास का अलर्ट
EU की विदेश नीति प्रमुख काजा कैलास ने इस बहस की सच्चाई उजागर की।
उनका कहना था कि दोस्तों की लड़ाई का लाभ दुश्मन उठाता है।
चीन और रूस इस परिस्थिति में खुश होंगे, उन्होंने कहा।
उनका कहना था कि ग्रीनलैंड की समस्या नाटो के भीतर हल हो सकती है, न कि टैरिफ लगाकर।
उन्हें यह भी कहा कि यूक्रेन युद्ध इस बहस से ध्यान भटका रहा है।
मैक्रों और ब्रिटेन की कठोर प्रतिक्रिया
फ्रांसीसी राष्ट्रपति मैक्रॉन ने स्पष्ट रूप से कहा कि संप्रभुता पर कोई समझौता नहीं होगा।
टैरिफ की धमकियों को उन्होंने अस्वीकार कर दिया।
ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कियर स्टॉर्मर ने भी कहा कि नाटो सहयोगियों पर टैरिफ लगाना अनुचित है।
यूरोप का संदेश स्पष्ट है— एकता ही शक्ति है।
नाटो और सुरक्षा
NATO के भीतर हल निकाला जा सकता है अगर ग्रीनलैंड की सुरक्षा खतरे में है।
यही यूरोप चाहता है।
टैरिफ सुरक्षा और भरोसा बढ़ा देगा।
1 फरवरी पर टिकी दुनिया
अब सभी का ध्यान 1 फरवरी पर है।
क्या ट्रंप वास्तव में १०% टैक्स लागू करेंगे?
या अंतिम समय पर कोई समझौता होगा?
टैरिफ की उपस्थिति पश्चिमी देशों की एकता को कमजोर कर सकती है।
यह एक अस्थिर और नवीन विश्व व्यवस्था भी शुरू कर सकता है।
ग्रीनलैंड: बर्फ से छिपा हुआ ज्वालामुखी
आज ग्रीनलैंड दुनिया की राजनीति में सबसे चर्चा में है।
यह केवल जमीन का टुकड़ा नहीं है।
यह व्यापार, शक्ति और भविष्य की कहानी है।
बर्फ के नीचे काफी सुलग रहा है।
नेट वर्थ और सोशल मीडिया प्रेजेंस
डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर काफी सक्रियता दिखाई दी है।
वे अपनी बात को X और अन्य प्लेटफॉर्म पर करोड़ों लोगों तक पहुंचाते हैं।
उनकी नेट वर्थ अरबों डॉलर है।
उन्होंने रियल एस्टेट, मीडिया और ब्रांड से बड़ी संपत्ति बनाई है।
उनकी हर पोस्ट और बयान राजनीति और बाजार को हिला देता है।
उत्कर्ष
ट्रंप का टैरिफ यूरोप को हिलाकर रख दिया है।
यूरोप झुका नहीं, लेकिन जर्मनी पीछे हटा।
आने वाले दिनों में दोस्ती बचेगी या टूट जाएगी।
ग्रीनलैंड आज भी बर्फ में ढका हुआ है, लेकिन यह विश्व राजनीति में एक ज्वालामुखी बन गया है।