भारत और अमेरिका के बीच अंतरिम ट्रेड डील को लेकर देश में विवाद बढ़ा है। किसान संगठन इसे हानिकारक मानते हैं, हालांकि सरकार इसे किसानों के हित में बता रही है। विरोध, आरोप और प्रतिक्रिया एक साथ चल रहे हैं। इस समझौते में कृषि और खाद्य उत्पादों पर टैरिफ के संबंध में जो मुद्दे सामने आए हैं, उन्होंने कई प्रश्न उठाए हैं। ज्ञात लोगों ने कपास का उदाहरण देकर भी चेतावनी दी है। अब सवाल उठता है कि क्या यह डील किसानों के लिए सुरक्षा या जोखिम है?
भारत-अमेरिका के व्यापार सौदे क्या हैं?
भारत और अमेरिका ने अंतरिम ट्रेड डील पर समझौता किया है। समाचारों के अनुसार, इस अधिनियम में भारत को कुछ खाद्य और कृषि उत्पादों पर टैरिफ को हटाना या कम करना शामिल है। सरकार का कहना है कि संवेदनशील डेयरी और कृषि उत्पाद सुरक्षित हैं। किसान संगठनों का कहना है कि भारतीय किसानों को यह कदम कमजोर करेगा।
किसान संगठनों की तीव्र प्रतिक्रिया
संयुक्त किसान मोर्चा, एक किसान संगठन मंच, ने इस ट्रेड डील को सरकार का “पूर्ण आत्मसमर्पण” बताया है। संगठन ने वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल से तुरंत इस्तीफा मांगा है। उनका कहना है कि सरकार के दावों से डील के ढांचे की शर्तें मेल नहीं खातीं। संगठन ने चेतावनी दी है कि अगर आगे कदम बढ़ा तो देश भर में विरोध प्रदर्शन होगा।
सरकार का क्या पक्ष है?
सोशल मीडिया पर वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि किसानों के हित संवेदनशील कृषि और डेयरी उत्पादों में सुरक्षित हैं। उनका कहना था कि मक्का, गेहूं, चावल, सोया, मुर्गी पालन, दूध, पनीर, इथेनॉल, तंबाकू और कई सब्जियों के उत्पादों पर कोई छूट नहीं है।
कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी इसी तरह की टिप्पणी की। उनका कहना था कि किसानों की सरकार सबसे ऊपर है। इस समझौते में ऐसे किसी भी उत्पाद को शामिल नहीं किया गया है जो भारतीय किसानों को नुकसान पहुंचाएगा, उन्होंने कहा। साथ ही, उन्होंने कहा कि मसाले सुरक्षित हैं और डेयरी उत्पादों के लिए भारत का बाजार अभी नहीं खुला है।
विपक्ष ने प्रश्न उठाया क्यों?
सरकार पर विपक्षी कांग्रेस पार्टी ने विश्वासघात का आरोप लगाया है। कांग्रेस के प्रवक्ता पवन खेड़ा ने कहा कि इस डील से भारत अमेरिका का डंपिंग ग्राउंड बन सकता है। उनका दावा है कि भारत को अगले पांच साल में अमेरिका से 500 अरब डॉलर का आयात करना होगा। इससे आयात दोगुना होगा। उनका प्रश्न था कि भारत आखिरकार अमेरिका से कितना खरीदेगा।
जानकारों का मत
कृषि विशेषज्ञ देवेंद्र शर्मा का कहना है कि इस डील से अमेरिकी कृषि उत्पादों को अब तक नहीं मिली थी भारतीय बाजार में जगह मिल सकती है। दशकों से भारत पर दबाव रहा है कि वह अपना कृषि बाजार खोले, उन्होंने कहा। हाल ही में भारत ने किसानों के हितों को बचाया है, लेकिन इस डील के बयान पर कई प्रश्न उठते हैं।
अमेरिका का कहना है कि इस समझौते से उसका सबसे बड़ा बाजार खुला है, इसका अर्थ समझना महत्वपूर्ण है, उन्होंने कहा। साथ ही उन्होंने कहा कि अगले पांच साल में भारत को 500 अरब डॉलर का आयात करना पड़ेगा क्योंकि अमेरिका को भारत से व्यापार घाटा हुआ है। सवाल यह है कि किस पर इसका बोझ पड़ेगा।
भारत-अमेरिका कृषि विनिमय का चित्र
भारत और अमेरिका के बीच कृषि का करीब आठ अरब डॉलर का व्यापार होता है। भारत से अमेरिका को मसाले, चावल और झींगा भेजा जाता है। अमेरिका भारत को दालें, मेवे और सेब भेजता है। अमेरिकी कृषि मंत्री ने कहा कि इस डील से भारत-अमेरिका कृषि व्यापार में घाटा कम होने की उम्मीद है। अमेरिका ने लंबे समय से कपास, सोयाबीन और मक्का के लिए भारतीय बाजार खोला है।
सब्सिडी का महत्वपूर्ण अंतर
देवेंद्र शर्मा ने सब्सिडी भी उठाई। उनका दावा था कि अमेरिका किसानों को भारी सब्सिडी देता है। वहां एक किसान को हर साल 64,000 डॉलर मिलते हैं। भारत में इसकी कीमत करीब 64 डॉलर है। यही कारण है कि दोनों देशों के किसानों में बराबरी की प्रतिस्पर्धा कैसे होगी?
कपास का उदाहरण क्यों महत्वपूर्ण है?
कपास से अंतर स्पष्ट दिखता है। भारत में करोड़ों किसान कपास पर निर्भर हैं, लेकिन अमेरिका में इस फसल को उगाने वाले बहुत कम किसान हैं। अमेरिका में बड़े खेत और अधिक मशीनों का इस्तेमाल है। भारत में खेत बहुत छोटे हैं, इसलिए किसान मेहनत पर अधिक निर्भर हैं।
देवेंद्र शर्मा कहते हैं कि अमेरिका हर साल अपने कपास किसानों को बड़ी सब्सिडी देता है। भारत में कपास किसान बहुत कम सहायता पाते हैं। भारत में हाल ही में कपास के आयात पर शुल्क शून्य करने के बाद बहुत अधिक कपास आया। इससे भारतीय किसानों को कम दाम मिले और बाजार में सप्लाई बढ़ी। कुछ महीनों में इसका प्रभाव देखा गया।
भविष्य में क्या हो सकता है?
कपास का यह अनुभव बताता है कि आयात में वृद्धि से किसानों की आय प्रभावित होगी। विशेषज्ञों का कहना है कि यह सिर्फ एक शुरुआत है। यदि सोयाबीन, मक्का और अन्य उत्पादों में भी ऐसा होता है, तो स्थिति और खराब हो सकती है।
किसान संगठनों के प्रमुख मुद्दे
संयुक्त किसान मोर्चा ने कहा कि इस डील से अमेरिकी कंपनियों का पशु आहार बाजार पर दबदबा बढ़ सकता है। उनका दावा है कि भारतीय बाजार में अमेरिकी गेहूं आने पर किसानों को बहुत नुकसान होगा। साथ ही, वे जीएम खाद्य और बीजों के आयात को खतरा बताते हैं। संगठन ने कहा कि यह मुक्त व्यापार नहीं है क्योंकि भारत शून्य शुल्क लगा रहा है और अमेरिका अधिक शुल्क लगा रहा है।
विरोध की चेतावनी
किसान संगठन प्रधानमंत्री से भारत-अमेरिका मुक्त व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर नहीं करने की मांग कर रहे हैं। उनका कहना था कि अगर उनकी बात नहीं सुनी गई तो पूरे देश में विरोध होगा। उन्हें 12 फरवरी को आम हड़ताल में भाग लेने का भी आह्वान किया गया है।
उत्कर्ष
भारत-अमेरिका ट्रेड डील का चित्र स्पष्ट नहीं है। सरकार का दावा है कि किसानों की सुरक्षा सुरक्षित है। बहुत से जानकार और किसान संगठन इसे खतरा बता रहे हैं। जैसा कि कपास में दिखाया गया है, छोटे-छोटे बदलाव भी बहुत बड़ा असर डाल सकते हैं। सबका ध्यान अब अगले कदम पर है। यह देखना होगा कि बहस कैसे चलती है और किसानों की आवाज कितनी सुनी जाती है।