भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु नदी के पानी को लेकर पुराना विवाद एक बार फिर चर्चा में है। इस बार मामला नीदरलैंड के हेग तक पहुंच गया है। पाकिस्तान ने भारत की जलविद्युत परियोजनाओं पर आपत्ति जताते हुए अंतरराष्ट्रीय अदालत का दरवाजा खटखटाया। लेकिन भारत ने भी उतने ही साफ शब्दों में जवाब दिया। भारत ने कहा कि वह इस अदालत को मान्यता ही नहीं देता। इसलिए उसके किसी आदेश का कोई मतलब नहीं है। यह खबर अब दोनों देशों के रिश्तों और पानी के मुद्दे को फिर से सुर्खियों में ले आई है।
सिंधु जल समझौता और पुराना विवाद
भारत और पाकिस्तान के बीच पानी को लेकर समझौता बहुत पुराना है। इसे सिंधु जल समझौता कहा जाता है। यह समझौता कई साल पहले हुआ था। इसका मकसद यह था कि दोनों देशों के बीच नदियों के पानी का सही बंटवारा हो सके। लंबे समय तक यह समझौता चलता रहा। लेकिन हाल के सालों में हालात बदले। सीमा पर तनाव बढ़ा। आतंकवादी हमले हुए। इसके बाद भारत ने कड़ा रुख अपनाया।
भारत का कहना है कि पाकिस्तान की हरकतों के कारण यह समझौता फिलहाल स्थगित है। जब समझौता ही लागू नहीं है, तो उससे जुड़ी किसी अदालत या मध्यस्थता संस्था का भी कोई मतलब नहीं रह जाता।
पाकिस्तान की नई चाल
जब भारत ने सिंधु जल समझौते को लेकर सख्त कदम उठाए, तो पाकिस्तान परेशान हो गया। उसने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर शिकायत करना शुरू कर दिया। इसी कड़ी में वह हेग स्थित कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन पहुंचा। यह अदालत खुद को अंतरराष्ट्रीय विवाद सुलझाने वाली संस्था बताती है।
पाकिस्तान ने आरोप लगाया कि जम्मू-कश्मीर में भारत जो जलविद्युत परियोजनाएं बना रहा है, उनसे उसके हिस्से का पानी प्रभावित हो सकता है। उसने कहा कि इन परियोजनाओं से नियमों का उल्लंघन हो रहा है। पाकिस्तान चाहता है कि भारत इन प्रोजेक्ट्स से जुड़े कागज और आंकड़े साझा करे।
हेग की अदालत और सुनवाई
नीदरलैंड के हेग शहर में यह अदालत स्थित है। इसे कई लोग अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता अदालत के रूप में जानते हैं। इस अदालत ने 2 और 3 फरवरी को सुनवाई तय की थी। अदालत के जज ने भारत से बगलिहार और किशनगंगा परियोजनाओं से जुड़े संचालन के आंकड़े मांगे।
अदालत का कहना था कि वह इन आंकड़ों के आधार पर फैसला करेगी। लेकिन भारत ने इस मांग को सीधे खारिज कर दिया। भारत का कहना है कि उसने कभी इस अदालत को कानूनी मान्यता नहीं दी। इसलिए वह कोई कागज देने के लिए बाध्य नहीं है।
भारत का दो टूक जवाब
भारत ने बहुत साफ शब्दों में कहा कि वह इस अदालत के अधिकार क्षेत्र को नहीं मानता। सरकार की ओर से कहा गया कि इस कोर्ट के आदेश अवैध और शून्य हैं। भारत का तर्क सीधा है। जब उसने कभी इस अदालत को स्वीकार ही नहीं किया, तो उसके आदेश कैसे लागू हो सकते हैं।
भारत ने यह भी कहा कि यह अदालत अपने आप में किसी संधि का हिस्सा नहीं है। इसलिए इसके फैसले भारत पर बाध्यकारी नहीं हो सकते। भारत का रुख पूरी तरह स्पष्ट है और उसने कोई नरमी नहीं दिखाई।
बगलिहार और किशनगंगा परियोजनाएं
जम्मू-कश्मीर में बनी ये दोनों जलविद्युत परियोजनाएं भारत के लिए बहुत अहम हैं। बगलिहार और किशनगंगा से बिजली बनती है। इनसे स्थानीय लोगों को फायदा होता है। साथ ही देश की ऊर्जा जरूरतें भी पूरी होती हैं।
पाकिस्तान का कहना है कि इन परियोजनाओं से उसके हिस्से के पानी पर असर पड़ता है। लेकिन भारत इससे सहमत नहीं है। भारत का कहना है कि ये परियोजनाएं नियमों के अनुसार बनाई गई हैं। इनमें किसी तरह की गड़बड़ी नहीं है।
भारत का कानूनी तर्क
भारत का कहना है कि जब सिंधु जल समझौता ही फिलहाल स्थगित है, तो उससे जुड़े किसी भी मध्यस्थता निकाय का अस्तित्व अपने आप खत्म हो जाता है। यानी अगर मूल समझौता लागू नहीं है, तो उसके तहत बनी कोई संस्था भी काम नहीं कर सकती।
भारत ने पहले भी यही बात कही थी। जब 2025 में स्थायी मध्यस्थता न्यायालय ने दावा किया था कि उसे किशनगंगा और रैटल परियोजनाओं पर सुनवाई का अधिकार है, तब भी भारत ने कड़ा विरोध किया था। विदेश मंत्रालय ने तब भी कहा था कि भारत ऐसी किसी अदालत को नहीं मानता।
पाकिस्तान की कोशिशें क्यों नाकाम हो रहीं
पाकिस्तान बार-बार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत को घेरने की कोशिश करता रहा है। लेकिन हर बार उसे ज्यादा सफलता नहीं मिली। इस बार भी स्थिति कुछ ऐसी ही दिख रही है।
भारत का कहना है कि यह सब पाकिस्तान की राजनीतिक चाल है। वह दुनिया का ध्यान अपने आंतरिक मुद्दों से हटाना चाहता है। पानी का मुद्दा उठाकर वह दबाव बनाना चाहता है। लेकिन भारत अपने फैसले पर अडिग है।
अंतरराष्ट्रीय कानून पर भारत का नजरिया
भारत अंतरराष्ट्रीय कानून का सम्मान करता है। लेकिन वह किसी ऐसी संस्था को नहीं मानता, जिसे उसने खुद स्वीकार न किया हो। भारत का कहना है कि हर अदालत की एक सीमा होती है। बिना सहमति के कोई भी संस्था किसी देश पर आदेश नहीं थोप सकती।
भारत यह भी कहता है कि वह द्विपक्षीय बातचीत में भरोसा रखता है। यानी दोनों देशों के बीच बातचीत से ही समाधान निकलना चाहिए। तीसरे पक्ष की दखलअंदाजी भारत को मंजूर नहीं है।
आम लोगों पर क्या असर
पानी का विवाद सिर्फ कागजों और अदालतों तक सीमित नहीं रहता। इसका असर आम लोगों पर भी पड़ता है। भारत में इन परियोजनाओं से बिजली बनती है। इससे घरों में रोशनी आती है। स्कूल, अस्पताल और कारखाने चलते हैं।
पाकिस्तान में भी लोग पानी पर निर्भर हैं। इसलिए यह मुद्दा संवेदनशील है। लेकिन भारत का कहना है कि वह किसी का हक नहीं छीन रहा। वह सिर्फ अपने हिस्से के पानी का सही इस्तेमाल कर रहा है।
आगे क्या हो सकता है
फिलहाल भारत ने अपना रुख साफ कर दिया है। उसने अदालत के किसी भी आदेश को मानने से इनकार कर दिया है। अब देखना यह होगा कि पाकिस्तान आगे क्या कदम उठाता है।
संभव है कि पाकिस्तान फिर किसी और मंच पर जाने की कोशिश करे। लेकिन भारत के लिए उसकी नीति साफ है। भारत बिना दबाव के अपने राष्ट्रीय हितों के अनुसार फैसले लेगा।
निष्कर्ष
सिंधु के पानी को लेकर यह विवाद नया नहीं है। लेकिन इस बार मामला और ज्यादा साफ हो गया है। भारत ने दिखा दिया है कि वह अपने अधिकारों से पीछे नहीं हटेगा। हेग की अदालत हो या कोई और मंच, भारत की नीति स्पष्ट है।
पाकिस्तान की यह कोशिश भी फिलहाल नाकाम होती दिख रही है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि दोनों देश इस मुद्दे को कैसे आगे बढ़ाते हैं। लेकिन एक बात तय है। भारत ने अपना संदेश साफ शब्दों में दे दिया है।