वेनेजुएला संकट: रूस-चीन क्यों नहीं आए बचाने और छोटे देशों के लिए क्या खतरा?

वेनेजुएला में हाल ही में हुए अमेरिकी हमले ने पूरी दुनिया को हिला दिया है। अमेरिका की सेना ने राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को हिरासत में ले लिया है। इस कदम ने वैश्विक राजनीति में भारी हलचल मचा दी है। सवाल उठ रहा है — जब रूस और चीन वेनेजुएला के दोस्त हैं, तो उन्होंने मदद क्यों नहीं की? और इस पूरे घटनाक्रम का छोटे देशों के लिए क्या मतलब है?

रूस और चीन की चुप्पी क्यों?

अमेरिकी कार्रवाई के बाद रूस, चीन और ईरान ने मादुरो की गिरफ्तारी की निंदा तो की, लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठाया। इसका कारण उनके अपने हित और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियाँ हैं।

रूस का कोई रक्षा समझौता नहीं

रूस और वेनेजुएला ने मई 2025 में रणनीतिक साझेदारी समझौता किया था। लेकिन यह केवल आर्थिक, तकनीकी और रक्षा सहयोग तक सीमित था। इसमें आपसी रक्षा या युद्ध के समय मदद देने का कोई प्रावधान नहीं था। यानी रूस कानूनी रूप से वेनेजुएला के लिए लड़ने को मजबूर नहीं है।
रूस पहले से ही यूक्रेन युद्ध में उलझा हुआ है। उसकी सेना, संसाधन और उपकरण उसी मोर्चे पर व्यस्त हैं। अमेरिका से भिड़ना रूस के लिए एक और जोखिम खोलना होता।

चीन की प्राथमिकता पैसा, युद्ध नहीं

चीन और वेनेजुएला के रिश्ते आर्थिक हैं। चीन ने अरबों डॉलर का कर्ज वेनेजुएला को दे रखा है। बीजिंग अब इन कर्जों की वसूली पर ध्यान देना चाहता है, न कि किसी नए युद्ध में कूदना।
अगर चीन अमेरिका से भिड़ता है, तो उसके व्यापारिक रिश्ते खतरे में पड़ जाएंगे। 2025 में ट्रंप और शी जिनपिंग की बैठक के बाद दोनों देशों के बीच कुछ सुधार हुए थे। मादुरो का खुलकर साथ देने से चीन के लिए फिर से सब बिगड़ सकता था।

ईरान और क्यूबा: सीमित समर्थन

क्यूबा और ईरान वेनेजुएला के करीब हैं। क्यूबा ने खुलकर समर्थन तो दिया, लेकिन उसके पास सैन्य ताकत कम है। ईरान ने कुछ ड्रोन और रक्षा उपकरण भेजे थे, मगर अमेरिका से सीधे टकराव से वह भी बच रहा है।
इस तरह से, वेनेजुएला के सबसे करीबी दोस्त नैतिक रूप से तो उसके साथ हैं, लेकिन मैदान में उतरने का जोखिम कोई नहीं लेना चाहता।

अमेरिकी कार्रवाई से दुनिया क्यों डरी हुई है

अमेरिका का यह कदम सिर्फ वेनेजुएला की सरकार के खिलाफ नहीं, बल्कि पूरी विश्व व्यवस्था के लिए एक चेतावनी बन गया है। अब दूसरे देशों को भी डर है कि कहीं ऐसा उनके साथ तो नहीं होगा।

नई “दादागीरी” की शुरुआत

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वेनेजुएला पर हमला कर राष्ट्रपति को पकड़ लिया, और अब इसे अपनी जीत बता रहे हैं। पर यह दुनिया भर के छोटे देशों के लिए खतरे की घंटी है।
अब छोटे राष्ट्रों को डर रहेगा कि कोई बड़ा देश कभी भी हमला कर सकता है। उन्हें अपनी सेना पर ज़्यादा खर्च करना पड़ेगा और स्कूल या अस्पताल जैसे ज़रूरी क्षेत्रों में बजट कटौती करनी पड़ सकती है।

शासन पलटने की होड़

अगर अमेरिका किसी देश में राष्ट्रपति को गिरा सकता है, तो बाकी ताकतवर देश भी यही रास्ता अपनाएँगे।
अब कोई भी बड़ा देश अपने पड़ोसी को पसंद न आने पर “तानाशाही खत्म करने” के नाम पर हमला कर सकता है। इससे पूरे विश्व में अराजकता फैल सकती है।

संसाधनों की लूट का नया दौर

अमेरिका के असली इरादे अब साफ़ नज़र आने लगे हैं। ट्रंप ने खुद कहा कि अमेरिका अब वेनेजुएला के तेल उद्योग को संभालेगा। इससे यह साबित होता है कि हमला राजनीतिक नहीं बल्कि आर्थिक हितों के लिए था।

मादुरो पर लगाए गए आरोप — तानाशाही, वोट चोरी और ड्रग्स तस्करी — अब सिर्फ बहाना लगते हैं। असली मकसद वेनेजुएला के तेल और गैस संसाधनों पर कब्जा करना था।
इसी तरह, अमेरिका की नज़र अब कांगो और नाइजीरिया जैसे खनिज-समृद्ध देशों पर भी हो सकती है।

बढ़ सकते हैं सैन्य हस्तक्षेप

पहले दुनिया में विवाद बातचीत से सुलझाए जाते थे, लेकिन अब खतरा यह है कि सेना का इस्तेमाल हर जगह बढ़ जाएगा।
अगर कोई देश कमजोर हुआ या उसकी सरकार अमेरिका, रूस या चीन को पसंद नहीं आई, तो वह सैन्य दबाव झेल सकता है।

यह चलन छोटे देशों की स्वतंत्रता और संप्रभुता पर हमला करेगा। कुछ देशों में तो पहले भी बार-बार सरकार बदली है। अब यह खतरा और बढ़ सकता है।

अब किसे खतरा सबसे ज्यादा?

वैश्विक तनाव अब बढ़ चुका है। कई देश आने वाले महीनों में सीधे खतरे में पड़ सकते हैं।

1. ईरान

अमेरिका लंबे समय से ईरान में सत्ता पलट की कोशिश करता रहा है। अब जब वेनेजुएला का उदाहरण सामने है, तो संभावना है कि अगला निशाना ईरान बने।

2. क्यूबा और कोलंबिया

ट्रंप ने हाल ही में कोलंबिया के राष्ट्रपति से बहस की थी और उनकी सरकार पर ड्रग्स तस्करी का आरोप लगाया था। इस वजह से क्यूबा और कोलंबिया दोनों अब सतर्क हैं।

3. इजरायल और उसके विरोधी देश

मध्य पूर्व में इजरायल छोटा देश है, लेकिन उसकी सैन्य ताकत बहुत बड़ी है। उसका रुख भी सख्त है। विश्लेषकों को डर है कि अब वह भी अपने दुश्मनों के खिलाफ वेनेजुएला जैसा कदम उठा सकता है।
सूत्रों के मुताबिक, वह इस समय तुर्की पर खास ध्यान दे रहा है।

4. रूस

रूस पहले से यूक्रेन में युद्ध लड़ रहा है। अब ट्रंप का कदम उसे नैतिक बल देगा कि वह भी यूक्रेन के नेतृत्व को निशाना बना सकता है।

5. चीन

चीन के लिए यह स्थिति एक अवसर बन सकती है। अब वह दक्षिण चीन सागर, ताइवान या फिलीपींस में अपनी शक्ति दिखाने की कोशिश कर सकता है।
पहले अमेरिका चीन की सैन्य कार्रवाइयों को “अवैध” कहकर रोकता था। लेकिन अब जब उसने खुद वैनेजुएला में वही किया है, तो उसका नैतिक अधिकार खत्म हो गया है।

छोटे देशों का संकट

वेनेजुएला पर हमला केवल एक देश की कहानी नहीं है, यह छोटे देशों की असुरक्षा की शुरुआत भी है।
अब हर छोटा देश अपने पड़ोसियों से डरने लगा है — चाहे वह एशिया हो या अफ्रीका।

वे देशों को अब अपनी सुरक्षा बढ़ाने के लिए हथियार खरीदने और रक्षा बजट बढ़ाने पर मजबूर होना पड़ेगा। इससे शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं कमजोर होंगी।
इस नई स्थिति में दुनिया का हर देश अपने हित में सोचने लगेगा। वैश्विक एकता कमजोर हो सकती है।

निष्कर्ष

वेनेजुएला पर अमेरिकी हमला दिखाता है कि दुनिया में फिर से शक्ति की राजनीति लौट आई है।
रूस और चीन चुप हैं क्योंकि उनके अपने लाभ और डर हैं।
अमेरिका के इस कदम ने नए भू-राजनीतिक खेल की नींव रख दी है, जिसमें ताकतवर देश अपनी मनमानी करेंगे और छोटे देश डर में जीएंगे।

अगर दुनिया ने अब भी संयम नहीं दिखाया, तो आने वाले समय में यह “वेनेजुएला मॉडल” कई जगह दोहराया जा सकता है — और तब शायद, कोई भी देश सुरक्षित नहीं रहेगा।

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